क्या भाजपा की आन्तरिक कलह ने उप चुनावों में कांग्रेस को जीत दिलाई ?

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रामस्वरूप रावतसरे

राजस्थान के दो विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस को जीत मिली है। वल्लभनगर (उदयपुर) में भाजपा के उम्मीदवार हिम्मत सिंह चौथे नंबर पर रहे, जबकि धरियावद (प्रतापगढ़) में भाजपा के खेत सिंह मीणा तीसरे नंबर पर रहे। दोनों उपचुनावों में कांग्रेस की जीत से मुख्य मंत्री अशोक गहलोत का कद और ऊंचा हो गया है। उपचुनाव के प्रचार के दौरान सचिन पायलट महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश आदि के दौरे पर रहे जबकि गहलोत और उनके समर्थक मंत्रियों ने ही दोनों उपचुनावों की कमान संभाली। धरियावद की सीट तो कांग्रेस ने भाजपा से छीनी है। यहां भाजपा के विधायक गौतम मीणा के निधन के कारण उपचुनाव हुआ था। लेकिन भाजपा ने दिवंगत विधायक के परिवार के किसी सदस्य को उम्मीदवार बनाने के बजाए खेत सिंह मीणा को उम्मीदवार बनाया। खेत सिंह मीणा इतने कमजोर साबित हुआ कि वे बीटीपी के उम्मीदवार से भी पीछे रह गए। यहां कांग्रेस के नगराज मीणा ने बड़ी जीत हासिल की है।
उदयपुर के वल्लभनगर से दिवंगत कांग्रेस विधायक गजेंद्र सिंह शक्तावत की पत्नी प्रीति शक्तावत को उम्मीदवार बनाया। गहलोत ने ऐसा तब किया, जब गजेंद्र सिंह शक्तावत कांग्रेस के उन 18 विधायकों में शामिल थे, जो गत वर्ष सचिन पायलट के नेतृत्व में एक माह के लिए दिल्ली चले गए थे। गहलोत ने शक्तावत परिवार के प्रभाव और सहानुभूति का फायदा उठाने के लिए प्रीति शक्तावत को ही उम्मीदवार बनाया। भाजपा ने हिम्मत सिंह झाला को उम्मीदवार बनाया जो चौथे नंबर पर रहे। धरियावद की सीट भाजपा से छीन कर गहलोत ने एक ओर विधायक का समर्थन प्राप्त कर लिया है। कहा जा सकता है कि अब कांग्रेस की राजनीति में गहलोत ने अपनी स्थिति को और मजबूत कर लिया है।
धरियावद और वल्लभनगर में भाजपा की शर्मनाक हार हुई है। जानकार लोगों का कहना है कि भाजपा के नेता अब भले ही सरकार पर चुनाव में सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग का आरोप लगाए, लेकिन उपचुनाव में भाजपा की रणनीति भी विफल रही। धरियावद में दिवंगत विधायक गौतम लाल मीणा के पुत्र को टिकट न देकर भाजपा ने राजनीतिक चूक की। वल्लभनगर में भाजपा को चौथे स्थान पर धकेलने में आरएलपी के उम्मीदवार उदयलाल डांगी का भी अहम रोल रहा।
विधानसभा के दोनों उपचुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद प्रदेश कांग्रेस का एक पक्ष यह माना जा रहा है कि नवंबर 2023 में होने वाले विधानसभा के चुनाव में अशोक गहलोत का नेतृत्व ही रहेगा। गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस लगातार दूसरी बार सरकार बना सकती है। हालांकि पिछले 25 वर्षों में राजस्थान में एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस की सरकार बनने की परंपरा रही है। दो उपचुनावों में जीत से जहां गहलोत के समर्थक उत्साहित है वहीं सचिन पायलट के समर्थकों का कहना है कि पायलट के नेतृत्व में उपचुनाव जब जीते गए, जब प्रदेश में भाजपा की सरकार थी। इसलिए राजस्थान की राजनीति में पायलट के नेतृत्व को नकारा नहीं जा सकता। आम तौर पर उपचुनाव के परिणाम सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में ही रहते हैं। यदि गहलोत इन दोनों उपचुनावों की जीत का श्रेय लेते हैं,तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि  2019 में उनके नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी। लोकसभा चुनाव में प्रदेश की सभी 25 सीटों पर कांग्रेस की हार कैसे हो गई? हारने वालों में सीएम गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत भी शामिल थे। खैर खुश होने के लिए एक चुटकी भर चीनी भी काफी है।
भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनियां ने विधानसभा उपचुनाव में पार्टी की हार को स्वाभाविक व परिस्थितिजन्य बताया है। पूनियां ने ट्वीट किया कि आलोचनाओं से बच कर सीख और सबक़ लेकर आगे बढ़ना है। लेकिन जानकारों की मानें तो बीजेपी की हार का सबसे बड़ा कारण पार्टी का दोफाड़ होना है। वसुंधरा राजे की सतीश पूनिया से खींचतान के चलते कार्यकर्त्ताओं का मनोबल रसातल में पहुंच रहा है। पार्टी ने जो रणनीति बनाई वो भी समझ से परे है। दिवंगत विधायकों के परिवार के सदस्यों को टिकट न देने से मामला बिगड़ा तो खींचतान ने उसमें तड़का लगा दिया।
वल्लभनगर में वसुंधरा राजे के साथ ही दूसरा फैक्टर भी हावी रहा। रणधीर सिंह भिंडर और मेवाड़ के कद्दावर नेता गुलाबचंद कटारिया का 36 का आंकड़ा बताया जाता है। कटारिया नहीं चाहते थे कि भिंडर को टिकट मिले। लिहाजा यहां की राजनीति खेमों में बंटी रही और पार्टी को जबर्दस्त हार का सामना करना पड़ा। वल्लभनगर में बीजेपी नेताओं के अहम की लड़ाई के कारण यह विधानसभा क्षेत्र बीजेपी की प्रयोगशाला बनकर रह गया है। भाजपा के बड़े नेताओं के अर्न्तद्वंद और प्रदेश नेतृत्व को नकार कर गलत टिकट वितरण के कारण भाजपा धरियावद और वल्लभनगर  दौनों ही सीटों पर मतों के बड़े अन्तर से उप चुनाव  हार गई है।
राजस्थान विधानसभा उपचुनावों में बीजेपी को मिली करारी हार के बाद अब प्रदेश संगठन पर सवाल उठने लगे हैं। वल्लभनगर और धरियावद में हुई पार्टी की बड़ी हार के बाद वसुंधरा राजे खेमे के पूर्व विधायक भवानी सिंह राजावत ने पार्टी की कमान राजे का सौंपने की मांग की है। राजावत के अनुसार अगर ऐसा नहीं हुआ तो पार्टी के 2023 का चुनाव जीतना मुश्किल हो जायेगा। हाईकमान को अब बिना किसी देरी के पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को राजस्थान की कमान संभला देनी चाहिये। अन्यथा जिस प्रकार इन उपचुनावों में पार्टी टक्कर में भी नहीं आ पाई उसी तरह आगामी चुनावों में भी पार्टी की ऐसी दुर्गति होगी।
राजस्थान बीजेपी के नीति विषयक शोध विभाग के राज्य प्रमुख डॉ. शुक्ला ने भी प्रदेश संगठन पर सवालिया निशान लगाये हैं। शुक्ला ने कहा कि पार्टी आगामी 2023 में राजस्थान में बीजेपी की सरकार बनाने के लिये कृतसंकल्पित है। लेकिन आज के परिणामों को देखते हुये प्रदेश भाजपा नेतृत्व को आत्म अवलोकन की जरुरत है। डॉ. शुक्ला राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके हैं। दोनों सीट जीतने के बाद जहां गहलोत और उनके समर्थक अत्यधिक उत्साहित है। वहीं भाजपा में राजे समर्थकों को सतीश पूनियां के विरूद्ध बोलने का एक और मौका मिल गया है। उन चुनाव में भाजपा की सीट चले जाना प्रदेश नेतृत्व की रणनीति पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। भाजपा कांग्रेस को दो टुकड़ों में बता रही थी लेकिन इन उपचुनावों वह खुद कई टुकड़ों में विभक्त नजर आ रही है।

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