हकीकत

0
549
अक्सर गरीबों को लड़ते झगड़ते देखा है।
रोटी के लिए बच्चों को बिलखते देखा है।।
नवयुवकों को बन ठन के संवरते देखा है।
नशे में मदमस्त लोगों को  बहकते देखा है।।
अपने हुनर से लोगों के घर बनते देखा है।
उनकी खूबसूरत बगिया को महकते देखा है।।
आशिकी में युवाओं को  मरते देखा है।
माँ बाप को उनके हमने तड़फते देखा है।।
फैशन में नई पीढ़ी को तन  समेटते देखा है।
राजेश हकीकत को ख्वाबों में लपेटते देखा है।।
कवि राजेश पुरोहित
भवानीमंडी

LEAVE A REPLY