खुद से मिलने का भी कभी वक्त निकालिए…

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rajendra saraswat
राजेन्द्र सारस्वत
किसी मर्मस्पर्शी कविता या गीत की पंक्ति अथवा कोई दिल को छू लेने वाले शेर को गौर से पढें सुने और उस पर थोड़ा गंभीरता से मनन करलें तो, उससे मनोरंजन के साथ ही जीवन के लिये मूल्यवान सूत्र भी मिल सकता है। उदाहरण के लिए हर कोई दूसरों से खूब मिलता-जुलता है। विचार-विमर्श करता है। दुःख-सुख सांझा करता है। वैर-वैमनस्य करता है। अकारण लोगों के फट्टे में टांग अड़ाता है। बिना मांगे परामर्श देता है या धक्के की चौधर करता है। मतलब कि कारण या अकारण व्यक्ति अपना पूरा जीवन दूसरों पर चिंतन में समाप्त कर लेता है। कभी दो क्षण बैठकर अपने आप से साक्षात्कार नहीं करता। ताकि अपनी कमियों, कमजोरियों और बुराईयों पर विचार कर उनमें सुधार की सोच सके।
कहते हैं समय और धैर्य व्यक्ति के सबसे अच्छे मित्र होते हैं। व्यक्ति स्वयं के प्रति धैर्य के साथ विचार करे और समय रहते स्वयं के साथ इमानदारी बरते तो एक श्रेष्ट जीवन का निर्माण संभव है। किसी विद्वान ने कहा है कि हमारा जीवन आमतौर पर हमारे विचार, व्यवहार और आदतों पर निर्भर करता है। अगर हमारे विचार उत्तम, सकारात्मक तथा अन्यों के प्रति सद्भाव लिये हुए होंगे तो हम एक सुंदर संसार के निर्माता बन सकते हैं। हमारा स्वभाव अच्छा होगा तो सब हमसे प्रेम करेंगे। घर-परिवार में सदैव सौहार्द का वातावरण बना रहेगा। हमारी ऊर्जा जीवन की प्रगति के लिये व्यय होगी। रही बात आदतों की तो यह बात कहने की नहीं है कि अच्छी आदतों से एक बेहतर इन्सान बनता है। बुरी आदत अच्छे भले मानव को दानव बना डालती है।
मैं बहुत विनम्रता के साथ कहूंगा कि लोग कभी भी अपने विचार, स्वभाव और आदतों के बारे में नहीं सोचते। उनकी बातचीत का विषय अपने परिवारजन, मित्र और आस-पड़ौस के लोगों अथवा अपने सम्पर्क में आने वालों के विचार, व्यवहार और उनकी आदतों के इर्द-गिर्द घूमते रहते है। कहा गया है कि दूसरों के बारे में सोचते रहने के स्थान पर इस समय का दशांष भी स्वयं पर विचार कर लिया जाय तो दुनिया में से आधे दुःख – दर्द, क्लेश, झगड़े टंटे और विवाद उत्पन्न ही न हों। पर इन सबके लिये स्वयं से साक्षात्कार आवश्यक है। साध्वी ऋंतम्भरा जी ने इस पर बहुत सुंदर वक्तव्य दिया है। कहा है-स्वयं का आंकलन ही आध्यात्म है। हमारे वेदांत तो भीतर की यात्रा पर विशेष जोर देते हैं। ब्रह्मकुमारी वालों का तो पूरा जोर ही स्व चिंतन पर है। इस विचार में जोर दिया गया है कि यदि इन्सान स्वयं को समझ ले तो उसे कुछ और जानने की आवश्यकता ही नहीं रह जाय। भीतरी यात्रा सबसे उत्तम यात्रा है। योग में भी एक सूत्र है- स्वाध्याय. राजस्थान पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी जी ने इस पर बहु सुंदर टिप्पणी की है कि -शांत बैठकर चिंतन करना, स्वयं के बारे में स्वयं से प्रश्न करना, जीवन का मार्ग तय करना, घर में, कार्यस्थल पर, समाज में, देश में और सृष्टि के अंश रूप में जीवन की उपयोगिता का मार्ग निश्चित करना, सकारात्मक भावों की निरंतरता बनाए रखना, जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलने में यह मार्ग बहुत कारगर सिद्ध होगा।
विषय बहुत विस्तृत है एक कहानी के माध्यम से अपनी बात स्पष्ट करूंगा। ’’एक युवा लड़की एक पीसीओ पर गई। उन दिनों सेलफोन नहीं था। उसने काऊंटर पर बैठी मैडम से एक नम्बर मिलाने को कहा। उधर से एक स्त्री ने हैल्लो कहा। फोन का स्पीकर ओन रह गया था। लड़की ने कहा-आप फलां मैडम बोल रही हैं। सामने से आवाज आई ’’हां बोल रही हूं. कहिये !’’ जी, युवती ने कहा-मैने सुना है आपको घर कार्य के लिये काम वाली चाहिये. मुझे काम की बहुत सख्त जरूरत है। आपने गलत सुना है। उधर से जवाब आया-मेरे पास आलरेडी एक काम करने वाली लड़की है। वह बहुत अच्छी है-मैं उसके काम से संतुष्ट हूं। मुझे और किसी की जरूरत नहीं है।’’ युवती ने कहा – जी मुझे आप उससे आधे वेतन पर रखलें आपको काम में कोई शिकायत नहीं आएगी। मैं बहुत ही जरूरतमंद हूं।
उधर से थोड़े क्रोधित से स्वर में स्त्री ने कहा-तुम बात को समझी नहीं हो क्या। मैने कह दिया कि मेरे काम करने वाली के काम से मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं। मैं उसे हटाना तो दूर मैं अगले महीने उसका पगार दुगुना कर रही हूं। बस अब बात खत्म और उधर से फोन बंद कर दिया गया। उस युवती ने अपनी डबडबाई आँखें पोंछी। बिल पे कर जाने लगी तो पीसीओ वाली मैडम ने उसे आवाज दी कहा-सुनो तुम्हें काम चाहिये। मेरे यहां एक काम करने वाली की जरूरत है। पगार जो चाहे ले लेना। खाना-रहना फ्री, आज ही काम शुरु कर दो। जी, आपका धन्यवाद पर मैं आपके पास काम नहीं कर सकती। युवती बोली-असल में मैं अब जहां काम करती हूं. अभी-अभी मैं वहां की मालकिन से ही बात कर रही थी। साल में एक बार फोन कर मैं मालकिन से बात कर लेती हूं। इससे मुझे अपने काम का मूल्यांकन हो जाता है। एक शेर है–
’’ मैं नहीं कहता औरों से मिलना छोड़ दीजिये आप,
पर खुद से मिलने का भी कभी वक्त तो निकालिए.. ’’
राजेन्द्र सारस्वत, 1/45, हाऊसिंग बोर्ड,

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