धूमधाम से सम्पन्न हुआ संस्कार भारती, दिल्ली का 12 वां ‘काव्य कौमुदी’ उत्सव

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कला की महत्वपूर्ण संस्था संस्कार भारती , दिल्ली प्रान्त की ओर से आदिकवि वाल्मीकि जयन्ती के उपलक्ष्य में शनिवार , 7 अक्टूबर, 2017 की शाम 12 वें ‘काव्य कौमुदी’ काव्योत्सव के अंतर्गत एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का भव्य आयोजन केदारनाथ साहनी सभागार, सिविक सेंटर , मिंटो रोड, नयी दिल्ली में किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन रा. स्व. संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मा. मनमोहन वैद्य , संस्कार भारती के वयोवृद्ध संस्थापक मा. योगेन्द , संस्कार भारती के अखिल भारतीय अधिकारीगण श्री सुरेश बिंदल , मा. अमीर चंद , श्री सुबोध शर्मा , श्री चेतन जोशी आदि ने किया। प्रधानमंत्री जी के स्वच्छता अभियान को समर्पित इस कवि सम्मेलन में इस बार दिल्ली नगर निगम के 5 सफाई कर्मचारियों को विशेष रूप से सम्मानित किया गया। इस सम्मान को देने का उद्देश्य वाल्मीकि जी की जयंती के अवसर पर समाज में समरसता का भाव जगाना भी था। उन्हें 5 तोले का चाँदी का सिक्का, प्रतीक चिन्ह, अंगवस्त्र और वाल्मीकि रामायण की प्रति भेंट की। इसके अतिरिक्त संस्था की ओर से इस वर्ष का श्री माधव गोलवरकर काव्य सम्मान प्रख्यात कवि श्री संतोषानंद को और श्री गोपालकृष्ण अरोड़ा कला सम्मान प्रख्यात मूर्तिकार पद्मभूषण श्री राम वी सुतार को दिया गया। सम्मान में अंगवस्त्र, सम्मान चिन्ह , श्रीफल , वाल्मीकि रामायण की प्रति और 21000 रु. की सम्मान राशि भेंट की गई। मेरठ से पधारे ओज के प्रख्यात कवि डॉ. हरिओम पंवार ने जब ये पंक्तियाँ सुनाईं तो सभागार भारत माता की जय के नारों से गूँज उठा – बंदूकों की गोली का उत्तर सदभाव नही होता हत्त्यारों के लिए अहिंसा का प्रस्ताव नही होता कोई विषधर कभी शांति के बीज नही बो सकता है और भेड़िया शाकाहारी कभी नही हो सकता है हास्य के सुपरिचित कवि डा. सुनील जोगी ने हास्य रस की तो बौछार की ही लेकिन बेटी को लेकर जब उन्होंने ये पंक्तियाँ सुनाईं तो सभी को भावविभोर कर दिया – मेहंदी कुमकुम रोली का त्योहार नही होता रक्षाबन्धन के चन्दन का प्यार नही होता उसका आंगन हरदम सूना सूना रहता है जिसके घर मे बेटी का अवतार नही होता कविसम्मेलन का कुशल संचालन करते हुए हास्य और ओज के विश्वविख्यात कवि श्री राजेश चेतन ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘ वनवासी राम’ सुना कर सारे वातावरण को राममय कर दिया – मात पिता की आज्ञा का तो केवल एक बहाना था मातृ भूमि की रक्षा करने प्रभु को वन में जाना था देश के जानेमाने दोहाकार श्री नरेश शांडिल्य के दोहों ने अपना अलग ही रंग जमाया । राम और शबरी पर लिखे उनके दोहों को काफ़ी पसंद किया गया – वो निखरा जिसने सहा, पत्थर पानी घाम। वन-वन अगर न छानते , राम न बनते राम।। शबरी जैसी आस रख, शबरी जैसी प्यास। चल कर आएगा कुआँ, ख़ुद ही तेरे पास।। वीर रस के धुरंधर कवि डॉ अर्जुन सिसोदिया की ओज पूर्ण कवितायों से पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा – शेखर सुभाष अशफाक की धरा है यहाँ क्रान्ति का प्रवाह कभी रुकने ना पायेगा। सवा सौ करोड़ दिलों में लहरता हुआ ये लाड़ला तिरँगा कभी झुकने ना पायेगा।। हास्य और व्यंग्य की अपनी चुटीली कवितायों से श्रीमती बलजीत कौर तन्हा ने श्रोताओं को ख़ूब गुदगुदाया किसी को चाह लो तो चाहत हो जाती है अपना बना लो तो आदत हो जाती है मैने जान लिया दिल मे रहता है खुदा लोगो को हँसा लो इबादत हो जाती है ।बनारस से पधारे युवा कवि श्री चंद्रशेखर गोस्वामी ने अपने चर्चित गीत ‘ मिट्टी वाले दिए जलाना अबकी बार दिवाली में ‘ सुना कर चीन के माल के बहिष्कार का संदेश भी दिया – राष्ट्रीय हित का गला घोंट कर छेद न करना थाली में मिट्टी वाले दिए जलाना अबकी बार दीवाली में देश के धन को देश में रखना ,नहीं बहाना नाली में मिट्टी वाले दिए जलाना अबकी बार दिवाली में कवयित्री मधुमोहिनी उपाध्याय ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में प्यार को समर्पित गीत सुना कर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया – प्यार शीतल भी है ,शांति का घाम है है वसन्ती हवा ,फागुनी शाम है प्यार मीरा है , राधा का घनश्याम है प्यार गंगा सा पावन परम धाम है कवि सम्मेलन के अंत में हिंदी मंचों के लोकप्रिय गीतकार श्री संतोषानंद ने अपने गीतों को अपने ही अनूठे अंदाज़ में सुनाया तो पूरा सभागार झूम उठा । जब उन्होंने अपना मिलेनियम गीत सुनाया तो लोगों ने उठ कर तालियाँ बजाईं – ये प्यार का नग़मा है , मौजों की रवानी है ज़िन्दगी और कुछ भी नहीं , तेरी मेरी कहानी है…

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