बेचैन साहब हिंदी जगत की स्मृतियों में हमेशा जीवित रहेंगे

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अप्रतिम गीतकार, ग़ज़लगो, बेहतरीन काव्यपाठ के नायक दादा बेचैन साहब जिस कोरोना वायरस महामारी के दौर में गए हैं उसने पूरे देश को श्मशान बना दिया। पुत्र उनकी पार्थिव देह को अंतिम विदा नहीं कह सका, इससे बड़ी वक्त की विडंबना और क्या हो सकती है, उनके इलाज में कोई कसर न छोड़ी लेकिन उनकी मृत्यु मुकर्रर थी, कुंवर जी 79 साल का भरापूरा जीवन जी कर इहलोक से विदा हो गए किन्तु उनके गीत, उनकी ग़ज़लों की गूंज कभी भी मंद नहीं पड़ने वाली। असल में उनका नाम डॉ. कुंवर बहादुर सक्सेना है, ‘बेचैन’ उनका तख़ल्लुस है बेचैन। जी गाजियाबाद के एम.एम.एच. महाविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष रहे। आज देश-विदेश में आपका नाम सबसे बड़े गीतकारों और शायरों में शुमार किया जाता है। डॉ. कुंवर बेचैन साहब ने अनेक विधाओं में साहित्य सृजन किया। मसलन कवितायें भी लिखीं, ग़ज़ल, गीत और उपन्यास भी लिखे। उनके निधन को साहित्य जगत की एक बडी छति पहुची है। व्यवहार से सहज, वाणी से मृदु इस रचानाकार को सुनना-पढ़ना अपने आप में अनोखा अनुभव है। उनकी रचनाएं सकारात्मकता से ओत-प्रोत हैं।
डॉ. कुंवर बेचैन साहब अक्सर कहा करते थे कि- मनुष्य को तीन चीजों को जीवन में स्थान देना चाहिए, “प्यार, परिश्रम और परोपकार”, इन तीनों चीजों की उपस्थिति से जीवन सार्थक हो जाता है। मुझे आज भी याद है कि मुझे दादा बेचैन साहब ने लालकिला कवि सम्मलेन, दिल्ली के हिंदी भवन के सभागार में और दिल्ली के आजाद भवन के सभागार में हुए साहित्यिक आयोजन के दौरान मुझे दो बार दस-दस रुपये एवं एक बार सौ रुपये हस्ताक्षर सहित भेट किये, मेरे लिए यह उपहार अनुपम था। ट्रू मीडिया ग्रुप ने दादा बेचैन साहब के व्यक्तित्व-कृतित्व पर केन्द्रित विशेषांक भी प्रकाशित किया, जिसे देश-विदेश के साहित्यकारों एवं साहित्य प्रेमियो ने बहुत सराहा। ट्रू मीडिया के यूट्यूब चैनल द्वारा एक साहित्यिक साक्षात्कार डॉ. पुष्पा जोशी द्वारा लिया गया और उनके निधन के बाद एक वृतचित्र भी प्रसारित किया।
गुरुवार 29 अप्रैल को हिन्दी ग़ज़लों–गीतों के बेताज बादशाह दादा बेचैन साहब इस संसार को हमेशा के लिए अलविदा कह गए। अपनी एक ग़ज़ल में दादा बेचैन साहब ने कहा, “ये सुना था मौत पीछा कर रही है हर घड़ी, ज़िन्दगी से मौत फिर आगे निकल जाती है क्यूँ”– यह सच में जैसे ध्येय वाक्य बन गया है। अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में सादगी बरतने वाले दादा बेचैन साहब व्यवहार से सहज, वाणी से मृदु, ऐसे सर्जक थे जिन्हें सुनना-पढ़ना अपने आप में अनोखा अनुभव होता था। उनकी रचनात्मक दुनिया में अपनेपन के गूड रंग और सकारात्मकता की मौजूदगी हमेशा ताजगी और नए पन का अहसास कराती थी। जब भी दादा बेचैन साहब के घर( साहित्यिक मंदिर ) जाने का अवसर मिला तो कभी ऐसा नहीं लगा कि वह पहली बार आये हैं, हमेशा लगा जैसे वर्षो का मिलन है, वर्षो का सम्बन्ध है, वर्षो से अपनापन है। दादा बेचैन साहब से बातचीत के दौरान हमेशा ऐसा प्रतीत हुआ जैसे की किसी सखा से बात हो रही है, कभी लगा की पिता से बात हो रही है, कभी लगा बड़े भाई से बात हो रही है, कभी लगा अभिभावक से बातचीत हो रही है। दादा बेचैन साहब की इस रचना ने देश- विदेश के करोडो साहित्यकारों एवं साहित्य प्रेमियो के दिल को छू लिया–
“पूरी धरा भी साथ दे तो और बात है,
पर तू ज़रा भी साथ दे तो और बात है,
चलने को एक पाँव से भी चल रहे हैं लोग,
पर दूसरा भी साथ दे तो और बात है।”
– डॉ. कुँवर बेचैन की प्रस्तुति
दादा बेचैन साहब हिंदी जगत की स्मृतियों में हमेशा जीवित रहेंगे, आपको ट्रू मीडिया ग्रुप की विनम्र श्रद्धांजलि।

– ओमप्रकाश प्रजापति
( संपादक- ट्रू मीडिया पत्रिका)
( संपादक शिरोमणि एवं विद्या सागर से अलंकृत )

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