“मतलब का ब्यौहार”

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देखा इस संसार मे, मतलब का ब्यौहार।

जब लग सुख है पास, तब लग तेरो यार।।
तब लग तेरो यार, यार संग ही संग डोले,
पास आया दर्द तेरो, यार मुख से नही बोले।।
यार मुख से नही बोले, तू ना किसे सुहायो,
बैठ कर आंसू बहाय, निकट ना कोई आयो।
निकट न कोई आयो, कियो तेरी हँसी ठिठोली,
जो कहे तेरो आपने, वो बोले कड़वी बोली।
वो बोले कड़वी बोली, मन को चीर गयो,
दूर तक दिखे ना, जिसे अपना सखा कह्यो।
अपना सखा कह्यो, वो पल में होयो पराया,
खोकर सारा बावरे, क्या तोको है पाया,
क्या तोको है पाया, नयना ना छलकाय,
खुला गगन देख , आगे को कदम बढ़ाय।
आगे को कदम बढ़ाय, खुल जाएगी राह,
मंजिल के करीब आ, खड़ी फैलाय बाह।
खड़ी फैलाय बाह, बहुतेरा है तू एकला,
मुड़कर देख बावरे, तोरे पीछे है काफिला।
तोरे पीछे काफिला, यार निकट अब आया,
बुरे बख्त में जीका, मिला ना तोको साया।
मिला ना तोको साया, अब तेरो हुआ खुमार,
देखा “मलिक” संसार मे, मतलब का ब्यौहार।।

सुषमा मलिक, रोहतक 

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