ईश्वर का एहसास रखते हुए स्वयं को मानवीय गुणों से युक्त करें

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mata sudhiksha nirankari
-सत्गुरू माता सुदीक्षा जी महाराज

दिल्ली, 7 जून, 2021रू‘‘हर पल ईश्वर का एहसास रखते हुए अपने आपको मानवीय गुणों से युक्त करें’’ ये उद्गार निरंकारी सत्गुरू माता सुदीक्षा जी महाराज ने रविवार, 30 मई, 2021 को आयोजित वर्चुअल निरंकारी सन्त समागम में विश्वभर से लाखों की संख्या में उपस्थित निरंकारी श्रद्धालु भक्त एवं प्रभु प्रेमी सज्जनों को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए। संत निरंकारी मिशन की वेबसाईट द्वारा इस समागम का सीधा प्रसारण किया गया।
उल्लेखनीय है कि विगत् 23 मई से सत्गुरू माता सुदीक्षा जी सप्ताह में तीन बार अपने पावन दर्शन एवं आशीर्वाद सत्संग के वर्चुअल माध्यम से प्रदान कर रहे हैं।
सत्गुरू माता जी ने एक उदाहरण के माध्यम द्वारा समझाया कि यदि अपनी ही पलकों का बाल आँख में चला जाता है तो आँख को बड़ी पीड़ा उठानी पड़ती है। उस बाल को निकालने के पश्चात् भी कुछ देर तक आँख में जलन महसूस होती रहती है। इसी प्रकार से यदि हम किसी के प्रति कोई कठोर वचन बोलते हैं और भले ही उससे माफ़ी भी माँग लेते हैं तब भी उस व्यक्ति के हृदय में वह चोट रहेगी इसलिए हमंे अच्छे वचन, मीठी बातें बोलकर प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में सकारात्मक जगह बनानी चाहिए।
दक्षिण भारत का समागम ;
दक्षिण भारत के कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश एवं तेलंगाना आदि राज्यों के सभी जोनों द्वारा आयोजित वर्चुअल समागम में सत्गुरू माता सुदीक्षा जी महाराज ने फरमाया कि ‘‘आत्मविश्लेषण एवं आत्मपरीक्षण करते हुए स्वयं का सुधार करके मानवता के लिए हम एक वरदान बनें।’’
सत्गुरू माता जी ने कहा कि यदि हम स्वयं को सुधारने पर केन्द्रित हो जायेंगे, तब हमें दूसरों की कमियों को देखने का समय ही नहीं मिलेगा। छोटी-छोटी बातों पर भी जब हम संवेदनशील हो जायेंगे तब हमारे मुख से ऐसी कोई बात नहीं निकलेगी जो किसी को चोट पहुंचाये। हमारा दैनिक जीवन हो या कोई सेवा का अवसर; जब हम बिना प्रमाण के किसी भी बात को सही मान लेते हैं तब उसमें से बुनियादी तथ्य छूट जाता है। परिणामस्वरूप किसी के हृदय को ठेस पहुंचती है। अतः स्वयं को एक तरफ़ रखकर जो ज़िम्मेदारी है उसको बखूबी निभाना है ताकि प्रत्येक व्यक्ति को हम खुशी ही दे पायें।
माता जी ने आगे कहा कि सन्तों, पीरों, वलियों ने युगों-युगों से जो मार्ग दर्शाया है, वही नेक और सच्चा है। हमने उसी मार्ग पर चलकर संतुलित जीवन जीना है। परिवार, समाज, देश एवं मानवता के प्रति जो हमारी भूमिका है उसे पूर्णतः निभाना है। हमारे अंदर का वास्तविक व्यक्तित्व तथा हमारे स्वभाव को मिलाते हुए एक ऐसा चरित्र का निर्माण करना है कि जिससे हम अपने आप में एक सर्वोत्तम मनुष्य बन पायें।
दक्षिण पूर्व एशिया का समागम ;
दक्षिण पूर्वी एशिया के सिंगापुर, हांगकांग, इंडोनेशिया, जापान, फिलीपीन्स, मलेशिया एवं थाईलैंड आदि देशों के निरंकारी भक्तों द्वारा संयुक्त रूप में वर्चुअल समागम का आयोजन किया गया। सत्गुरू माता सुदीक्षा जी महाराज ने फरमाया कि जब निरंकार प्रभु के साथ नाता जोड़कर जीवन जिया जाता है, तभी जीवन सही अर्थों में सफल कहलाने योग्य बन जाता है।
विश्व पर्यावरण दिवस का उल्लेख करते हुए सत्गुरू माता जी ने कहा कि परमात्मा ने कुदरत की रचना बहुत ही खूबसूरती से की है। प्रकति की इस बाहरी सुंदरता को तो हमने निखारना ही है परन्तु साथ ही साथ हमने अपने मन का प्रदूषण भी दूर करना है।
जापान के मशहूर चेरी ब्लोज़म ट्री का उदाहरण देते हुए सत्गुरू माता जी ने कहा कि उनकी महत्ता केवल जिस मौसम में उन पर फूल खिलते हैं तब तक सीमित नहीं है, किन्तु फूल न आने के उपरांत वृक्ष को महत्वहीन समझकर अगर काट दिया जाए, तो फिर आगे से न ही वह वृक्ष बचेगा और न ही उस पर फूल खिलंेगे। इसी भांति परमात्मा की स्तुति भी केवल दुःख पीड़ा के समय ही न करें अपितु निरंतर जीवन में उसकी महत्ता बनीं रहनी चाहिए।
सत्गुरू माता जी ने सिंगापूर, हांगकांग तथा पूरे विश्वभर से मिशन द्वारा वर्तमान की विष्म परिस्थ्तिियों में की जाने वाली सेवाओं का उल्लेख करते हुए कहा, कि सेवा का यह ज़ज्बा ऐसे ही बढ़ता चला जाए। यही शुभकामनाएं सभी संतों के लिए व्यक्त करीं कि सिर्फ आत्मकेन्द्रित न होकर दूसरों के जीवन में हमारे कारण थोड़ा सकून मिल जायें, उसी प्रयत्न में ही हमें जुटते चले जाना है।
अंत में सत्गुरू माता जी ने यही कहा कि हम जहां स्थिरता की भी बात कर रहे हैं, वहां उस तरह मन की स्थिरता वैसी नहीं कि जैसे कोई स्टैच्यू हो। मन को नियंत्रित करते हुए हमें एक जीती जागती स्थिर अवस्था को धारण करना है।

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