मां की ममता का दस्तावेज है ‘स्मृतियां’

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बेगूसराय बिहार के राजीव रंजन शर्मा द्वारा रचित काव्य संग्रह ‘स्मृतियां’ उनकी मां की ममता एवं उनकी यादों का एक सुंदर दस्तावेज है। प्रखर गूँज प्रकाशन  द्वारा प्रकाशित इस संग्रह में ५२ कविताएं हैं। अधिकाँश कविताएं मातृत्व भाव से परिपूर्ण है। कुछ कविताएं प्रकृति का भी मानवीकरण करते हुए उसकी शून्यता एवं सुंदरता का वर्णन करती हैं। राजीव रंजन शर्मा उर्फ राम दरबारी जी ने प्रथम कविता ‘मां तेरी याद’ में अपनी माता से जुड़ी स्मृतियों का जीवंत चित्रण किया है।

‘पवन देव से कितनी मिन्नतें मैंने की,
क्या दिखाई पड़ी मेरी मां की कांति ?
पर कहां पता बताते मेरे मां की,
ना लाते चरण रज ही मेरे मां की।’

कहते हैं कि जब तक मां है तब तक आप बाल्यावस्था में ही होते हैं, मगर यहाँ सभी बालकों की भांति कवि पवन देव से आग्रह कर रहा है कि मेरे मां की चरण धूलि ही ला दो जिससे मैं मां को महसूस कर सकूं। ‘अजन्मा’ कविता में कवि जीवन की विसंगतियों से घबराकर भ्रूण अवस्था में ही अपनी माता के गर्भ में रहना चाहता है। अथवा राम या कृष्ण बनकर धरती पर
दुष्टों का संहार करने की कामना करते हुए कहता है।
‘त्राहिमाम व पीड़ित लोग यहाँ
तब फरिश्ता बन आना चाहता हूँ।’
‘नाराज बदरी’ कविता में कवि प्रकृति को नारी रूप में देखते हुए उसे एक जिद्दी दुल्हन कहता है। जो सबको अनजान समझकर वहां बरसना नहीं चाह रही, जबकि धरती अमृतधारा के बगैर निश्प्राण पड़ी हुई है। कवि बादल के बारिश की कल्पना करके गदगद हुआ जा रहा है।

‘कानों में मधुर आवाज आई गुनगुनाते भंवरों की तरह,
उच्छृंखल मन नाच उठा पानी के छटपटाहट की तरह।’

गंगाजल आज दूषित हो चुका है। यह जल कभी मानव जीवन के लिए अमृत तुल्य था परंतु अब विष बन चुका है, तभी तो कवि अपनी कविता ‘अपमानित गंगा’ में यह कह रहा है कि गंगा तो अपमानित होते होते थक चुकी है। जिस गंगा में डुबकी लगाकर देवता भी पाप से मुक्ति पा जाते थे आज इस कलयुग में पतित पावनी गंगा स्वयं ही मैली हो चुकी है।

‘तभी तो देवों ने भी की है तेरी स्तुति
लगा डुबकी पा जाते पाप मुक्ति।’

इसके अतिरिक्त ‘मेरा गांव’, ‘गांव का अंगना’, ‘भारतीय किसान’ इत्यादि कविताएं भारत के ग्रामीण जीवन षैली का वर्णन करती हैं। गांव से जुड़ी कवि की यादें और किसानों के दुख दर्द अवश्य ही पाठकों को व्यथित करेंगे। ‘श्रद्धांजलि’, ‘सैनिकों की शहादत’, ‘देश प्रेम’, ‘जंग-ए-ऐलान’ इत्यादि कविताएं सरहद पर खड़े जवानों की देष के प्रति सच्ची भक्ति और आम जनता को अपना फर्ज याद दिलाती हैं। कवि कहता है–

‘काफी देर हो चुकी है अब तुम तनिक जाग भी जाओ,
जिस मिट्टी में जन्म लिया है उसका कर्ज तो चुकाओ।’

कुछ ऐसे ही ओजपूर्ण विचारधारा से लबरेज यह संग्रह पाठकों को अवश्य पसंद आएगा। शब्द सहज एवं सरल हैं जिसके भाव आसानी से आपके मन को छू लेंगें। कुछ कविताओं में प्रकृति एवं जीवन से जुड़ी संवेदनाओं की भी व्याख्या की गई है। व्यक्ति जब दुखी होता है तो उसे चारों ओर गहरा अंधेरा और नीरवता दिखाई देने लगती हैं मगर प्रकृति की मनोरम छँटा उसका मन मोड़ देती है और वह रम जाता है पंछियों के मनोविनोद में तो कभी बादलों के बदलते आकार में और अपना गम भी
भूल जाना चाहता है। कवि यह सोचता है–

‘उस अनंत को पा लेना है मुझे,
उस अनंत को छू लेना है मुझे।’
अंततः मैं यही कहना चाहूंगी कि यह कविता संग्रह आपको भी अपनी
स्मृतियों से मिलने के लिए बेसब्र कर देगा।

आरती प्रियदर्शिनी

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