शील – शर्म

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लोकतन्त्र  का  चौथा खम्भा,  नहीं   रहा   आजाद |
या   बहरी  सरकार  हुई   है, या  मिडिया   बर्बाद ||

हो सकते इसके दो कारण, सोचें तजकर स्वार्थ |
लोकतन्त्र कमजोर हुआ है, भूल गया निहितार्थ ||

मिडिया को लाचार बनाकर, चला अमानुष खेल |
लोकतन्त्र की बलिवेदी पर, तानाशाह    नकेल ||

या मिडिया बिक गया स्वार्थ में, छोड़ स्वयं सम्मान |
लोकतन्त्र के  भोलेपन का, लूट   रहा  है    मान ||

नमक मिर्च के साथ मिलाकर, खबरों का व्यापार |
इन  दोनों  ही  स्थितियों  में, लोकतन्त्र    की  हार ||

शील  शर्म  से  होता  पोषित, शील  शर्म  के   संग |
दोनों आपस में मिलकर के, भरें अलौकिक रंग ||

लोकतन्त्र का प्राण मीडिया, यह जनगण आधार |
शर्म  करें  औ सत्य चुनें हम, सपने   हों    साकार ||

दुनिया  हम  पर  करे  इशारे, उससे   पहले   जाग |
सत्य – धर्म के अनुयायी हम, गायें    मंगल    राग ||

अवध शर्म मानव का गहना, स्व शासन हथियार |
शर्म स्वयं का मूल्यांकन है, गलत – सही सुविचार ||

अवधेश कुमार अवध

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  1. समाज को उजागर करने वाली लाजवाब रचना

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