समाज के विभिन्न वर्गों के लिए सुन्दरकाण्ड की उपयोगिता

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sharda mehta
सम्पूर्ण राम-साहित्य हमारी सनातन संस्कृति का पोषक है। उसका प्रत्येक क्रियाकलाप तथा घटनाक्रम श्रीराम भक्त का मार्गदर्शन करते हैं। जीवन के नकारात्मक विचारों को नष्ट कर सकारात्मक सोच की ओर अग्रसर करते हैं। गोस्वामी तुलसीदासजीकृत श्रीरामचरितमानस का पंचम काण्ड सुन्दरकाण्ड हमारा पग-पग पर मार्गदर्शन करता है। समाज के कतिपय प्रमुख वर्ग के लिए सुन्दरकाण्ड कितना उपयोगी है इस विषय पर हम अपने विचार व्यक्त करने का प्रयत्न करेंगे-
विद्यार्थी वर्ग – बालक के जीवन की सुदृढ़ नींव उसकी बाल्यावस्था में ही रखी जाती है। उस समय उसमें जिन आदतों का बीजारोपण कर दिया जाता है, वहीं से उसके जीवन का विकासक्रम प्रारंभ हो जाता है। श्रीराम की बाल्यावस्था पर दृष्टिपात करें तो हमें बालकाण्ड पढ़ना होगा-
‘प्रात:काल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा।।
आयसु मागि करहि पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा।।Ó
(श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड दो. २०५/४)
श्रीराम के जीवन में बाल्यावस्था की आदतें पल्लवित और पुष्पित होती रही और वनवास काल में भी उनका जीवन विभिन्न आश्रमों को निशाचरविहीन करने में समर्पित रहा। अध्ययन के प्रति समर्पण, धैर्य, आत्मविश्वास की भावना प्रत्येक विद्यार्थी में होनी चाहिए। जब तक उसे अपने लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए तब तक उसके कार्य में निरन्तरता बनी रहनी चाहिए-
हनुमान तेहि परसाकर पुनि कीन्ह प्रनाम।
रामकाजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम।।
(श्रीरामचरितमानस सुन्दरकाण्ड दो. १)
विद्यार्थियों को अध्ययन के लिए जाने के पूर्व तथा परीक्षा कक्ष में प्रवेश के पूर्व निम्नलिखित चौपाई सदैव पढ़ना चाहिए-
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदय राखि कोसल पुर राजा।
(श्रीरामचरितमानस सुन्दरकाण्ड दोहा ४/१)
श्रीहनुमानजी का चरित्र विद्यार्थी के लिए प्रकाशपुंज है। जो भी कार्य उन्हें सौंपा जाता वे उसे बड़ी लगन, उत्साह और आत्मसमर्पण के साथ करते हैं। सीतान्वेषण का कार्य इस कथन का ज्वलन्त उदाहरण है। विद्यार्थियों के लिए हनुमानजी की कार्यशैली प्रेरणास्पद है। उनसे संयमित जीवन, ज्ञान, बुद्धि, विनम्रता, संवाद कौशल आदि सीखने को मिलता है। वयोवृद्ध व्यक्तियों का सम्मान करना भी हनुमानजी से सीखना चाहिए। जामवन्तजी वयोवृद्ध हैं। वे हनुमानजी को मौन देखते हैं। हनुमानजी की चुप्पी उन्हें अच्छी नहीं लगती है। वे हनुमानजी की शक्ति का स्मरण कराते हैं-
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना।।
पवन तनय बल पवन समाना। बुद्धि बिबेक विज्ञान निधाना।।
(श्रीरामचरितमानस किष्किन्धा दो. ३०/२)
जामवन्त जी श्री हनुमान जी को कहते हैं- हे बलवान सुनो, तुमने यह चुप्पी क्यों साधी है? तुम पवन के पुत्र हो, पवन के समान बलवान हो। बुद्धि, विवेक और विज्ञान की खान हो।
कवन सो कान कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।।
राम काज लगि तव अवतारा सुनतहिं भयउ पर्बताकारा।।
(श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड दोहा ३०/३)
अर्थात् जगत् में ऐसा कौन सा कठिन काम है जो तात! तुम से नहीं हो सकता है। श्रीराम के लिए ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमानजी ने पर्वताकार रूप दिखा दिया।
इस उदाहरण से यह दृष्टव्य है कि हनुमानजी वयोवृद्ध जामवन्त जी का सम्मान करते हैं। उनके सामने विनम्र हैं। उनके कहने पर रामजी का कार्य करने के लिए तत्पर हैं। मार्ग में उन्हें अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। वे समयानुसार अपने स्वरूप में परिवर्तन कर लेते हैं और लंका में प्रवेश करते हैं।
कुशल राजनयिक – श्रीहनुमानजी अपनी त्वरित बुद्धि और वाक् चातुरी का समय-समय पर प्रयोग कर अपने कार्य में सफल होते हैं। अशोक वाटिका में मेघनाद जब ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करता है तो श्री हनुमानजी उसका सम्मान करते हैं और मूर्च्छित हो जाते हैं। उन्हें रावण के दरबार में ले जाते हैं। रावण को अपना परिचय देते हुए वे कहते हैं-
जा के बल बवलेस ते जितेहु चराचर झारी।
तासु दूत में जा करि हरि आने हु प्रिय नारी।।
(श्रीरामचरितमानस सुन्दरकाण्ड दोहा २१)
अर्थात् लेशमात्र बल से सारे चराचर मात्र को तुमने जीत लिया और जिनकी प्रिय स्त्री को तुम हर लाए हो उनका मैं दूत हूँ। आपके प्रभुत्व को मैं जानता हूँ। यहाँ हनुमानजी यह परिचय देते हैं कि मैं श्रीराम का दूत हूँ। स्वभाव से मैं वानर हूँ। वाटिका में मुझे भूख लगी तो मैंने वृक्ष से फल तोड़े और खा लिए। श्रीराम के दूत होने के कारण वे क्षुधापूर्ति तो कर ही सकते हैं। सीताजी से निशानी के रूप में चूड़ामणि लाकर रामजी को देते हैं जिससे श्रीरामजी को पूर्ण विश्वास हो जाता है कि वे सीताजी से मिल कर आए हैं। विभीषण जब श्रीराम के पास आते हैं तो हनुमानजी प्रसन्न होते हैं। श्रीराम उन्हें शरणागति प्रदान करते हैं।
साहसी और महावीर – हनुुमानजी का साहसी और महावीर स्वरूप भी मानव मात्र के लिए अनुकरणीय है। सीताजी की आज्ञा से फल भक्षण करते हैं और वृक्षों को भी समूल तोड़ रहे हैं- ‘फल खाएसि तरु तो रैं लगा।Ó वाटिका के रक्षकों से निडर होकर मल्ल युद्ध करते हैं। रावण पुत्र अक्षय कुमार जब मध्यस्थता करने आता है तो हनुमानजी उसका वध कर देते हैं। मेघनाद के ब्रह्मास्त्र का सम्मान करते हैं। रावण दरबार में उसे सलाह देते हैं कि वो अभिमान त्याग कर श्रीराम नाम का भजन करें-
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।
(सुन्दरकाण्ड दोहा २३)
रावण यह सुनकर अत्यधिक क्रोधित होता है। वह कहता है-
‘मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।Ó
वह हनुमानजी के अंग भंग करना चाहता था पर विभीषण तथा सचिव ने सलाह दी कि कपि को अपनी पूँछ सबसे अधिक प्रिय होती है इसलिए इसमें वस्त्र बाँध कर आग लगा दी जाए। लंका के घरों में वस्त्र शेष नहीं रहे, तेल घी भी समाप्त हो गया। पूँछ की लम्बाई बढ़ती गई। हनुमानजी जरा भी विचलित नहीं हुए। वे लंका वासियों का मनोरंजन कर रहे थे। जलती हुई पूँछ के साथ वे सम्पूर्ण लंका में घूमे। धूँ-धूँ कर लंका जल गई। केवल विभीषण का घर व अशोक वाटिका सुरक्षित रहे। साहसी हनुमानजी समुद्र में कूद गए। वहाँ से सीताजी की अशोक वाटिका में आए। उनसे श्रीराम को देने के लिए निशानी प्राप्त की। यह घटनाक्रम हनुमानजी के साहसी तथा महावीर होने की ओर इंगित करता है।
गृहस्थ के लिए – सुन्दरकाण्ड एक गृहस्थ के लिए अत्यधिक उपयोगी है। इसमें गृह प्रबन्धन की शिक्षा प्राप्त होती है। एक गृहस्थ को सदैव संयमित, परिवार के कल्याण के लिए परिश्रमी, बहुमुखी भूमिका, दूरदर्शिता, संवाद करने में कुशल होना चाहिए। उसे विभीषण के समान सद्गुणी, अग्रज को समय-समय पर उचित सलाह देने वाला, श्रीराम का भक्त होना चाहिए। उसका रामनामांकित घर, आँगन में तुलसी-चौरा, विभीषण की आतिथ्यकला जो सनातन धर्म परम्परा की नींव है। लंका में सुख शान्ति स्थापित करने के लिए सर्वदा तत्पर रहना। एक सफल गृहस्थ को अपने घर में शनिवार और मंगलवार को सुन्दरकाण्ड का पाठ करना चाहिए। श्रीराम के सेवक हनुमानजी की विभीषण हर संकट की घड़ी में हृदय से सहायता करते हैं। एक गृहस्थ को अपने परिवार, नगर, देश तथा राष्ट्र में शान्ति स्थापित करने के लिए अपने इष्ट देव का सर्वदा स्मरण करना चाहिए।
व्यापारी वर्ग के लिए- प्रत्येक व्यापारी अपने व्यापार को फलता-फूलता देखना चाहता है। व्यापार में उतार-चढ़ाव, हानि-लाभ, माँग और पूर्ति का सन्तुलन, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की स्थिति आदि अनेक ऐसी परिस्थितियाँ हैं, जिसमें कि निर्णय क्षमता बौनी हो जाती है। ऐसे में उसे ईश्वर ही एकमात्र आश्रय दिखाई देता है, जो उसकी नैया पार लगा सकता है। मन बैचेन हो, नकारात्मकता ने जीवन को परेशानी में डाल रखा हो तो ऐसे समय इन पंक्तियों के स्मरण से सकारात्मक भाव आएंगे-
‘सिन्धु तीर एक भूधर सुन्दर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवन तनय बल भारी।।
(श्रीरामचरितमानस सुन्दरकाण्ड दोहा १/३)
व्यापारी को चाहिए कि व्यापारिक संस्थान का प्रतिदिन कार्य प्रारंभ करने के पूर्व श्रीराम और हनुमानजी का श्रद्धापूर्वक स्मरण करें-
‘प्रबसि नगर कीजै सब काजा। हृदय राखि कोसलपुर राजा।।Ó
(श्रीरामचरितामनस सुन्दरकाण्ड दोहा ५/१)
यदि संभव हो तो श्रीरामजी व हनुमानजी का चित्र लगाएँ। सुबह-शाम दीपक प्रज्ज्वलित करें। दिन में एक बार सुन्दरकाण्ड का पाठ करे, जिससे व्यापारी का मानसिक सन्तुलन बना रहेगा। सुख शान्ति बनी रहेगी। व्यापारीगण के समक्ष समस्याएँ सुरसा के मुँह के समान विकराल रूप ले ले तो भी आत्मविश्वास रखना चाहिए-
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रुप देखावा।।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रुप पवन सुत लीन्हा।।
(श्रीरामचरितामानस सुन्दरकाण्ड दोहा २/५)
नारी वर्ग के लिए- नारी वर्ग के लिए सुन्दरकाण्ड पूर्ण रूप से शिक्षाप्रद है। जिस प्रकार सीताजी रामभक्त हनुमानजी के अशोक वाटिका में पहुँचने पर उन पर विश्वास नहीं करती है। उन्हें शंका है कि वानर स्वरूप में छद्म वेष में कोई राक्षस आकर उनकी परीक्षा तो नहीं ले रहा है। पंचवटी में स्वर्ण मृग के रूप में मारीच राक्षस तथा साधु के वेष में रावण से वे धोखा खा चुकी हैं। इसलिए वे प्रतिपल सतर्क रहती हैं। वर्तमान समय में प्रत्येक नारी को भी सतर्क रहना चाहिए। क्योंकि हम प्रतिदिन महिलाओं के साथ होने वाली लूट, चारित्रिक अत्याचार तथा धोखाधड़ी की घटनाओं के समाचार पढ़ते रहते हैं। हनुमानजी ने जब रामनामांकित मुद्रिका उनके सम्मुख नीचे डाली तो भी उन्हें वह अंगार प्रतीत हुई जो वह आत्मदाह करने के लिए चाह रही थी। तब हनुमानजी ने वृक्ष के नीचे उतर कर सीताजी से विनती करते हुए कहा-
‘राम दूत मैं मातु जानकी। सत्यसपथ करुणानिधान की।Ó
(श्रीरामचरितमानस सुन्दरकाण्ड दोहा १३/९)
सीताजी जब ‘करुणा निधानÓ शब्द सुनती है तो उन्हें जनकपुरी की पुष्पवाटिका का स्मरण होता है जहाँ वे अपनी सखियों के संग गौरी पूजन के लिए जाती हैं। गौरी उन्हें आशीर्वाद देती है-
‘मन जाहि राच्यो मिलहि सो
वर सहज सुन्दर सांवरो।
करुणानिधान सुजान शील
सनेह जानत रावरो।।6।।
(श्रीराम स्तुति, गोस्वामी तुलसीदास)
जब हनुमानजी के मुख से वे ‘करुणानिधानÓ शब्द सुनती है तो उन्हें पूर्ण विश्वास हो जाता है कि यह कपि श्रेष्ठ श्रीराम का ही दूत है क्योंकि मैं ही श्रीराम को करुणानिधान कहती थी। महिलाएँ समाज में दिए जाने वाले विभिन्न प्रलोभनों से बचे। जैसे सीताजी रावण द्वारा दिए गए प्रलोभन को अस्वीकृत कर देती हैैं-
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मन्दोदरी आदि सब रानी।।
तव अनुचरी करउं पन मोरा। एक बार बिलोकुमम ओरा।।
(श्रीरामचरितमानस सुन्दरकाण्ड दोहा ९/४)
विभीषण की पुत्री त्रिजटा को अशोक वाटिका में सीताजी की सेविका के पद पर नियुक्त किया था-
त्रिजटा नाम राक्षसी एका। रामचरन रति निपुन विवेका।।
सीताजी उसका बहुत विश्वास करती थी। वह सीताजी को समयोचित सलाह देती थी और संकट के समय उनकी रक्षा करके उनका मनोबल बढ़ाती थी।
सुन्दरकाण्ड समाज के सभी वर्गों के लिए उपयोगी है। अवसाद के क्षणों में, कठिन परिस्थितियों में तथा एकाकी क्षणों में प्रत्येक व्यक्ति को अपने इष्ट देव का स्मरण करके आत्मिक शान्ति प्राप्त होती है। अवकाश के समय पाँच मिनिट मौन रहकर श्रीरामजी तथा हनुमानजी को स्मरण कर आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। भारत में तो सुन्दरकाण्ड के वाचन तथा भजन मंडली द्वारा पारायण की परम्परा प्रसिद्ध है ही विदेशों में भी जहाँ-जहाँ भारतीय निवास करते हैं वे भी अपनी भारतीयता तथा सनातन संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखते हैं-
मनोजवं मारुत तुल्य वेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथ मुख्यं
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये।।३३।।
(श्रीबुद्धकौशिकमुनि विरचित रारक्षास्तोत्रम्)

प्रेषक
डॉ. शारदा मेहता

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