“विस्मृत सी मैं हो रही” -कुमारी अर्चना

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जाने क्यों

विस्मृत सी मैं हो रही  me
ओझिल हो रहा मेरा अतीत
बंद पलकों में तो संभाल रखा था!

अभी तो मैं वृद्ध भी नहीं हुए
जो मेरी यादाशत कमजोर हो!

फिर क्यों “यादों का कोष” खाली हो रहा

वो बीती बातें
वो मुलाकाते
वो बीते दिन
वो रातें
वो सब कुछ जो कल तक
मेरे पास था
जाने कहाँ खो रहा !

भविष्य तो गर्त में छुप
करवटें ले रहा
पर मेरा वर्तमान क्यों हाथों से जा रहा
मैंने बंद मुठ्ठी में कर रखी है फिर भी!

जाने क्यों विस्मृत सी हो रही
ओझिल हो रहा मेरा अतित

ऐसा लगता मानो बरसों हो गए हो
मेरे तुम से मिले हुए
अभी रात तो मिले थे ख्वाबों में!

डॉक्टर ने कहा मेरे मन का टूटन है
अब तो ऐसा होगा ही
जल्द ही मैं तुमको
फिर खुद को भूल जाउँगी
फिर सब कुछ
शून्य में चली जाउँगी!

कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार.

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